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मंगलवार, मई 28, 2013

यात्रा नाथो के नाथ अमरनाथ की

एक हिंदी मासिक पत्रिका के यात्रा सेगमेंट के लिए लिखा गया मेरा ये लेख। आशा है आपको पसंद आयेगा......!

गर्मी का मौसम है, सूरज का पृथ्वी से प्रेम अपने चरम पर है जिसकी तपन से हम और आप झुलस रहे है, हर पल गाहे बगाहे प्रभु को याद करके कह रहे है, "कुछ तो दया करो" मन बस यही करता है चल भाग चल उन वदियॊ में जहा उसकी तपन ना पहुचे। मौसम भी है दस्तूर भी, तो मैंने सोचा क्यो ना इश बार यात्रा के जरिये आपको प्रभु से मिलाने उनके ही द्वार अमरनाथ ले चलु जहा आपके तन के साथ साथ मन को भी सुकू मिले। तो आइये चलते है बाबा भोलेनाथ की नगरी.....

अमरनाथ हिन्दुओ का एक प्रमुख शिव तीर्थ स्थल है। जो की कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में १३५ किलोमीटर दूर समुद्रतल से १३,६०० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर ) १९ मीटर और चौड़ाई १६ मीटर है जबकि ऊंचाई ११ मीटर है।

इश धाम की प्रमुख विशेषता गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग निर्मित होना है। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दशर्न के लिए लाखो लोग यहां आते है। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है जिसमे ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमे टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस शिवलिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है।श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावश्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यही है की यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबिक गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पारवती जी के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।
अमरनाथ के बारे में कई जनस्रुतिया भी प्रचलित है जैसे की इसी गुफा में माता पावर्ती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुनकर सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गये थे। गुफा में आज भी स्रधालुओ को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें स्रधालु अमर पक्षी बताते हैं। मान्यता है वे भी अमरकथा सुनकर अमर हुए हैं। कहा जाता है की जिन स्रधालुओ को कबूतरों का जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पावर्ती अपने प्रत्यक्ष दशर्नों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है की भगवान शिव ने अर्धांगिनी पावर्ती को इस गुफा में एक ऐसी कथा सुनाई थी, जिसमे अमरनाथ की यात्रा और उसके मार्ग में आने वाले अनेक स्थलों का वर्णन था। यह कथा कालांतर में अमरकथा नाम से विख्यात हुई।
पूरे यात्रा पथ के बारे में कुछ विद्वानों का  भी मत है की भगवान शंकर जब पावर्ती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओ को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये तमाम स्थल अब भी अमरनाथ यात्रा में आते हैं।
अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूवार्ध में एक मुसलमान गडरिये को चला था। आज भी मंदिर का चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिये के वंशजों को मिलता है। आश्चर्य की बात यह है की अमरनाथ गुफा एक नहीं है। अमरावती नदी के पथ पर आगे बढ़ते समय और भी कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखाई देती हैं। वे सभी बर्फ से ढकी हैं। अमरनाथ पर जाने के दो रस्ते हैं। एक पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बटलाल से। पहलगाम और बलटाल तक आप किसी भी सवारी से पहुँचें, यहाँ से आगे जाने के लिए अपने पैरों का ही इस्तेमाल करना होगा। अशक्त या वृद्धों के लिए सवारियों का प्रबंध किया जा सकता है। पहलगाम से जानेवाले रास्ते को सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बलटाल से अमरनाथ गुफा की दुरी केवल १४ किलोमीटर है पर यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टी से भी खतरनाक है। इशिलिये सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती है और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन रोमांच और जोखिम लेने का शौक रखने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है। रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।
मै जोखिम नहीं उठाता हु और आपसे भी यही आशा करता हु, क्योकि जीवन अनमोल है, पहलगाम तक जाने के लिए जम्मू-कश्मीर पयर्टन केंद्र से सरकारी बस हमेशा उपलब्ध रहती है। पहलगाम में गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था हमेशा की जाती है। तीर्थयात्रियो की पैदल यात्रा यहीं से आरंभ होती है। पहलगाम के बाद पहला पड़ाव चंदनबाड़ी है, जो पहलगाम से आठ किलोमीटर कीदुरी पर है। पहली रात तीर्थयात्री यहीं बिताते हैं। यहाँ रात्रि निवास के लिए कैंप लगाए जाते हैं। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यह यात्रा ज्यादा किठन नहीं है। चंदनबाड़ी से १४ किलोमीटर दूर शेषनाग में अगला पड़ाव रहता है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और खतरनाक भी है। यहीं पर पिस्सू घाटी के दशर्न होते हैं। फिर उसके बाद यात्री शेषनाग पहँच कर ताजादम होते हैं। यहाँ पवर्तमालाओं के बीच नीले पानी की एक खुबसूरत झील है। यह झील करीब डेढ़ किलोमीटर लम्बाई में फैली है। मान्यताओ के अनुसार शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील के बाहर दशर्न देते हैं। तीर्थयात्री यहाँ रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।
शेषनाग से अगला पड़ाव पंचतरणी आठ मील के फासले पर है। मार्ग में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे को पार करना पड़ता हैं, महागुणास चोटी से पंचतरणी तक का सारा रास्ता उतराई का है। पांच छोटी-छोटी सरिताए बहने के कारण ही इस स्थल का नाम पंचतरणी पड़ा है। यह स्थान चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊँचाई की वजह से ठंड भी ज्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियो को यहाँ सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं।
अमरनाथ की गुफा यहाँ से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती हैं रस्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नजदीक पहुँच कर पड़ाव डाल रात बिता सकते हैं और दुसरे दिन सुबह बाबा भोलेनाथ के वास स्थान अमरनाथ पहुच कर, उनके दर्शन कर, पूजा अर्चन कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। यह यात्रा काफी कठिन है, लेकिन अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुचते ही सफ़र की सारी थकान पल भर में छू मंतर हो जाती है और मन को अद्भुत आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है।
आशा है आपको मेरे द्वारा करायी गयी शब्दों की ये यात्रा पसंद आई होगी और आपके मन में भी एक बार वास्तविक यात्रा करने की हसरत जरूर जगी होगी।

शनिवार, मई 11, 2013

एक छोटी सी यात्रा बिठुर की

मैंने अक्सर महर्षि बाल्मीकि और उनके आश्रम के बारे में सुन और पढ़ रखा था, मन में सवाल भी आता था की क्या कभी मै वह जा पाउँगा? अभी कुछ दिनों पहले मेरा कानपूर जाना हुआ तो लगा आज मौका भी है दस्तूर भी, फिर क्या निकल पड़ा मै अपने दोस्त के साथ बिठुर के लिए। अब बिठुर क्या है? खुद पढ़िए और जानिए....
महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि बिठूर को प्राचीन काल में ब्रह्मावर्त नाम से जाना जाता था। यह शहर उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर से 22 किमी. दूर कन्नौज रोड़ पर स्थित है। शहरी शोर शराबे से उकता चुके लोगों को कुछ समय बिठूर में गुजारना काफी रास आता है। बिठूर में ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के अनेक पर्यटन स्थल देखे जा सकते हैं। गंगा किनार बसे इस नगर का उल्लेख प्राचीन भारत के इतिहास में मिलता है। अनेक कथाएं और किवदंतियां यहां से जुड़ी हुईं हैं। इसी स्थान पर भगवान राम ने सीता का त्याग किया था और यहीं संत वाल्मीकि ने तपस्या करने के बाद पौराणिक ग्रंथ रामायण की रचना की थी। कहा जाता है कि बिठूर में ही बालक ध्रुव ने सबसे पहले ध्यान लगाया था। 1857 के संग्राम के केन्द्र के रूप में भी बिठूर को जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा नदी के किनार लगने वाला कार्तिक अथवा कतकी मेला पूर भारतवर्ष के लोगों का ध्यान खींचता है।
वैसे तो वहा पर देखने के लिए कई स्थल है पर जो मुख्य है आइये आपको उसके बारे में बताता हु।

वाल्मीकि आश्रम- हिन्दुओं के लिए इस पवित्र आश्रम का बहुत महत्व है। यही वह स्थान है जहां रामायण की रचना की गई थी। संत वाल्मीकि इसी आश्रम में रहते थे। राम ने जब सीता का त्याग किया तो वह भी यहीं रहने लगीं थीं। इसी आश्रम में सीता ने लव-कुश नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। यह आश्रम थोड़ी ऊंचाई पर बना है, जहां पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। इन सीढ़ियों को स्वर्ग जाने की सीढ़ी कहा जाता है। आश्रम से बिठूर का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है।
ब्रह्मावर्त घाट- इसे बिठूर का सबसे पवित्रतम घाट माना जाता है। भगवान ब्रह्मा के अनुयायी गंगा नदी में स्‍नान करने बाद खडाऊ पहनकर यहां उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने यहां एक शिवलिंग स्थापित किया था, जिसे ब्रह्मेश्‍वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
पाथर घाट- यह घाट लाल पत्थरों से बना है। अनोखी निर्माण कला के प्रतीक इस घाट की नींव अवध के मंत्री टिकैत राय ने डाली थी। घाट के निकट ही एक विशाल शिव मंदिर है, जहां कसौटी पत्थर से बना शिवलिंग स्थापित है।
ध्रुव टीला- ध्रुव टीला वह स्थान है, जहां बालक ध्रुव ने एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की थी। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे एक दैवीय तारे के रूप में सदैव चमकने का वरदान दिया था।
इन धार्मिक स्थानों के अलावा भी बिठूर में देखने के लिए बहुत कुछ है। यहां का राम जानकी मंदिर, लव-कुश मंदिर, हरीधाम आश्रम और नाना साहब स्मारक अन्य दर्शनीय स्थल हैं।
ये सब जानने के बाद मन में एक बार वहा जाने का विचार तो आ ही गया होगा, पर अब सवाल ये उठ रहा होगा की वहा जाये कैसे और रुके कहा? तो आइये उसको भी बताता हु।
वायु मार्ग- बिठूर का नजदीकी एयरपोर्ट कानपुर व लखनऊ है। यहाँ दिल्ली से नियमित सुविधा उपलब्ध है।
रेल मार्ग- कल्याणपुर यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन है। कानपुर जंक्शन यहां का निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन है, जो की भारत के लगभग सभी बड़े सहरो से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग- बिठूर आसपास के शहरों से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। लखनऊ, कानपुर, आगरा, कन्नौज, दिल्ली, इलाहाबाद आदि शहरों से बिठूर के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध है।
बिठुर एक छोटा नगर है, इसलिए वहा पर ठहरने के लिए अच्छे होटल नहीं मिलेंगे पर कानपुर यहाँ से मात्र 22 किलोमीटर की दूरी पर है। जहा पर आप अपनी सुविधा अनुसार कोई भी होटल ले सकते है।
बिठुर के भौगोलीक स्थिति की बात करे तो ये लगभग 5 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 126 मीटर है। जबकि इस पूरे छेत्र में समानाय्तः हिंदी और अवधी बोली जाती है।
तो कब जा रहे है आप बिठुर? आशा है आपको मेरी ये यात्रा पसंद आई होगी।

रविवार, जनवरी 27, 2013

कशमकश जिंदगी की.........

कुछ ऐसी ही स्थिति आज कल जिंदगी में बनी हुई है हर एक मंजिल मेरे लिए अहमियत रखती है। मै हर एक जगह पहुचना भी चाहता हु, उन हर एक कार्यो को करना भी चाहता हु जो मैंने सोच रखा है, क्योकि उनसे मेरे साथ कई अन्य की भी आशाये जुडी है। पर समझ नहीं आ रहा है किसे पहले और कैसे करू? दिक्कत केवल एक है ....... साधन, जिसके बिना हर एक जगह तक पहुचना नामुमकिन तो नहीं पर हा कठिन जरूर है। मै कठिनाई से भी नहीं डरता। डरता तो केवल समय से हु, की कही देर न हो जाये। [किंजल]

शनिवार, दिसंबर 08, 2012

कब हम सीखेंगे? क्योकि.... "इतिहास अपने को दोहराता है"


गंगा घाट पर अर्ध्य देती महिला 

किसी भी श्रृष्टि की रचनात्मकता के लिए जीवन जरूरी है और जीवन के लिए जल! इतिहास के झरोखों में हम पलट कर देखे तो, हमे निश्चित यही दिखेगा की जितनी भी सभ्यताए निकली, पनपी, प्राचीन या आधुनिक नगर बसे सब किसी न किसी गतिमान जल स्त्रोत के समीप ही बसे। इन गतिमान जल स्त्रोतों में जो मुख्यतः थी वो हमारी नदिया ही थी। हर नदी ने ना जाने कितनो को जीवन दिया, कितनो को बसाया, उजाडा। अपने आचल में समेटे हुए ना जाने कितनी पीढियों सदियों को गुजरते देखा। कभी बच्चे के जन्म के लिए माओ को मन्नत मागते देखा तो कभी उसी बच्चे के जन्म पे महिलाओं को सोहर गाते। बच्चे की प्राप्ति के बाद भेट स्वरुप बालो को चढाते देखा तो उसीके कुशल क्षेम के लिए नदी के अन्दर समाहित होकर उगते और डूबते सूरज को अर्ध्य देते भी। बच्चा जब किशोरावस्था में पंहुचा तो अपने तट पर बसे गुरुकुलो, स्कुलो में कुशल व्यक्तित्व को पाने के लिए शिक्षा का भिक्षु बनते देखा तो थोडा बड़े होने पर अपने ही तट पर बच्चे का जनेव संस्कार भी होते देखा। जनेव के बाद उसके विवाह संस्कार में भी नदी ने खुद को प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से समाहित देखा। विवाह के उपरांत नवयुगल जोड़े को खुद के समीप आकर अब तक के लिए भेट देने के बाद फिर से कुशल जीवन के लिए, बच्चे के लिए दुआए मांगते देखा। जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुचने से पहले उसी प्राणी को अपने तट पर मोक्ष के लिए, खुद को प्रभु में समाहित करने के लिए राम नाम जपते देखा। अंतिम पड़ाव को प्राप्त करने के बाद उसी बच्चे के अवशेषों को खुद में समाहित कर प्रभु से मिलते भी देखा। इस पूरी प्रक्रिया के बाद भी बच्चे के बच्चो को अपने पूर्वजो के लिए अपने ही तट पर बछिया छु कर पिंड दान कर तर्पण करते देखा। ये तो थी मानव जीवन से जुडी एक सामान्य क्रिया अब आते कुछ और घटनाओं पर। न जाने कितने अन्य जीवो को नदियों ने अपने गोद से जोड़े रखा, कितनो को जीवन यापन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से रोजगार दिया। अपने तटों पर ही नदी ने न जाने कितनी संस्कृतियों के मिलन में, उत्सवो मेलो के रूप में लोगो को जुटते देखा। न जाने कितने भूखे पेटो को भरने के लिए अन्न उपलब्ध करने के साथ ही कितनो को भूखे पेट सोते भी देखा। नदी ने ही ना जाने कितनी बार प्यासी धरती की प्यास बुझाई ताकि उससे हमारे और आप जैसे ना जाने कितने लोगो के पापी पेट की प्यास बुझ सके। खैर क्या कभी हम इस नदी के बिना इस ससार की कल्पना कर सकते है? एक बार सोचिये जरा। है न भयावह।।।। 
संगम घाट पर कुड़ो का अम्बार
नदी ने ना जाने हमे कितना कुछ दिया, पर, हमने उसे क्या दिया?
शहरो से निकला शिवरेज का गन्दा पानी, कारखानों/फैक्ट्रियो से निकला रासायनिक कचरा, घरो से फेका गया पोलीथिन का कचरा या अपने स्वार्थ के लिए उसके मार्ग को अवरुद्ध कर बनाया गया बांध।
क्या हमने कभी सोचा इन सब से उस नदी पर क्या बीत रही है? शायद नहीं।
अल्लाह्पुर, इलाहबाद में बाढ़ की त्राशदी की एक झलक


कहते है प्रकृति अपने नियमो को खुद बनाती है। और उसमे किसी और का हस्तक्षेप उसे बर्दाश भी नहीं है। नदिया भी उसी प्रकृति का एक हिस्सा है, वो चंचल तितली की तरह हमेशा शांत इधर-उधर उड़ती रहती है। पर जब उसकी बर्दाश करने की शक्ति, सीमा से बहार हो जाती है तो, उसी नदी को रौद्र काली का रूप धारण करने में जरा भी समय नहीं लगता है। और जब वह काली का रूप धारण करती है तो भष्मासुर की तरह सब कुछ खाती चली जाती है और पूरी की पूरी सभ्यता, संस्कृति को पलट देती है जिसके अवशेष समय के साथ-साथ हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी खुदाइयो में ही मिलते है।
कौशाम्बी की खुदाई में मिले पुराने नगर के अवशेष 
दो बड़ी प्रचलित कहावते मुझे याद आ रही है जो मेरे हिसाब से शायद सटीक भी है- पहली तो : "जो समाज अपने अतीत से सबक नही लेता उसको नष्ट होने से कोई नहीं रोक सकता" और दूसरी "इतिहास अपने को दोहराता है"
इन कहावतो के बाद कुछ सवाल भी मन में आ रहे है। क्या हम इतिहास से कुछ सीखेंगे? उससे कुछ सबक लेंगे? या हम चाहेंगे इतिहास खुद को फिर से दोहराए? 
इन्ही सवालो के साथ आपको छोड़े जा रहा हु। सोचियेगा जरूर। इस पूरे लेख में कुछ पसंद आये या गलत लगे तो प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा, ताकि मै अपनी गलतियों को सुधार सकू। आभार!