मंगलवार, मार्च 25, 2014

अभी सूरज नहीं डूबा, पहले नाम होने दो.…! किंजल




बहुत दिनों से कोई पोस्ट नहीं डाला था, अब क्या करता। थी ही कुछ ऐसी अवस्था-व्यस्तता, इस दौरान कई इवेंट बीते, कई नये पुराने लोगो से मिलना-बिछड़ना हुआ, काफी कुछ सीखने को भी मिला पर लगा अभी काफी कुछ सीखना भी बाकी है, शायद जिंदगी भी सीखने का ही नाम है.…… इस सीखने सिखाने के सफ़र में मै कभी आत्मविश्वास से इतना भर जाता की लगता "अब तो समय हमारा है" और कभी इतना टूट जाता कि लगता "अब तो कुछ न बचा यारो" इस बीच कभी लाखो में खेला तो कभी अठन्नी को भी टहला। कभी यारो कि जमघट लगाये बैठा तो कभी एक साथ को भी तरसा……… और भी न जाने क्या क्या हुआ.…… पर इस पूरे क्रम में, मेरी आपबीती से, मेरे मन से अभी जो भाव निकल रहे है वो कुछ ऐसे है .......... गौर कीजियेगा ……


शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2014

चुनावों के मौसम में नेताओं का अभिनय

जब कुछ नेताओं को समाज के अलग अलग वर्गों के बीच उनकी समस्याएं सुनकर दुखी थोबड़ा बनाते हुए देखता हूँ तो मुझे बेचारे उन लोगों पे बड़ा तरस आता है जो अपनी समस्याएँ रो रो कर बताते हुए सोचते हैं कि अब उनकी समस्याओं का समाधान जरूर हो जाएगा क्योंकि राजा साहब बड़े दुखी हैं उनके लिए.
राजा साहब ने यही समस्याएँ पांच वर्ष पहले भी सुनी थी और सुनकर ऐसा ही दुखी थोबड़ा भी बनाया था, और पांच वर्ष पहले ही नहीं कई वर्षों से सुनते आ रहे हैं लेकिन उनका समाधान आज तक नहीं कर सके और हर दफा ऐसे अभिनय करते हैं कि जैसे ये समस्या आज ही पता चली हैं उनको...!

बेचारे परेशान लोग उनकी इस मुरझाई हुयी शकल को देखकर उन पर तरस खा लेते हैं और अपनी बागडोर फिर उनके हाथ में सौप देते हैं कि शायद इस दफा राजा साहब उनकी समस्याओं का समाधान जरूर करेंगे ...............ऐसे ही चला आ रहा है और चलता रहेगा..शायद.........................

शुक्रवार, जुलाई 26, 2013

ज्ञान की देवी को हमने आखिर धन्दे की देवी क्यों बना दिया है?

यूपी बोर्ड की मेरिट लिस्ट में इस साल इलाहबाद के कुकुरमुत्ता छाप स्कूलों और कोचिंगो के अधिकतर बच्चे छाये रहे। ये अलग बात है की बाद की प्रतियोगी परीक्षाओ में इन टापरो की हकीकत सामने आ ही जाएगी! कुछ दिनों पहले मेरा जिज्ञाषा वश संपादक कम दोस्त की हैसियत से उन बच्चो से मिलना हुआ। उनको और माहौल को देख कर लगा कही मै गलत बच्चो से तो नहीं मिल रहा हु? फिर मन में आया सरस्वती का वाश तो कही भी हो सकता है, आखिर कीचड़ में ही तो कमल खिलता है। सोचा क्यों न इश कमल को देखा ही जाये। न चाहते हुए भी मैंने उन बच्चो से कुछ सवाल पूछ ही लिये। पर अफ़सोस उनमे से कोई भी एक भी सवाल के सही जवाब नहीं दे सका। आखिर ऐसा क्यों? 

मैंने भी अपने आप से यही सवाल पुछा और इन अद्वितीय प्रतिभाओ को देख कर बाहर निकला तो आदतवश इसकी जड़ तक पहुचने के लिए निकल पड़ा। कुछ लोगो से पता किया तो मालूम चला की ये सब लक्ष्मी देवी और नक़ल के देवता की मेहरबानी है। कुछ और आगे बढ़ा तो GIC के अध्यापक महोदय मिल गये जिन्होंने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए बताया की ये तो कुछ नहीं है। पिछले साल तो उस विद्यालय के प्रबन्धक की बच्ची भी up की मेरिट लिस्ट में आई थी जो की इनसे भी कही गयी गुजरी प्रतिभावान थी, ये सब यहाँ के अलावा सीधे आयोग से भी सेटिंग करके होता है। फिर बोले बढा भ्रस्ताचार है इस शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा की देवी सरस्वती को लोगो ने बेच दिया है, उनसे लोग व्यापार कराने लगे है, हमसे ये कभी न होगा,,,,,,
तभी उनके मोबाइल ने जगमगाते हुए गायत्रीमंत्र का उदघोष किया। मेरा मन खुश हुआ चलो कम से कम आना तो सफल हुआ, कुछ नहीं तो आज के दौर में एक ऐसे आदर्शवादी शिक्षक से ही मुलाकात हो गयी। तभी अध्यापक महोदय ने फ़ोन पर कहा ठीक है कल आ जाओ काम हो जायेगा लेकिन हा अब से ऐसी बाते कभी फ़ोन पर मत करना, आजकल पुलिस वाले किसी भी सरीफ का नंबर सर्विश्लान्स पर डाल देते है। फिर फ़ोन काट कर वो बताने लगे की आज कल UP TET के भाषा विषय की कॉपी हमी लोगो के द्वारा हमारे विद्यालय में ही जाची जा रही है, अगर हम उसमे किसी का परोपकार कर दे तो क्या बुरा है? बेचारो की जिन्दगी सवर जाएगी, पूरी जिंदगी हमे वो दुवाए देंगे साथ ही हमे हमारी मेहनत का कुछ फल भी मिल जायेगा............ 60,000 की तनखा में आज होता ही क्या है? उनकी बाते सुनकर मुझे लगा कही वो मुझसे भी तो ये आशा नहीं लगा बैठे है की कही से एकाद TET वाले दीनदुखियो को उनसे मिलवाऊ,,,,,,
खैर रात के दस बज चुके थे,,, घर के लिए निकल पड़ा और रास्ते में सोचने लगा की ज्ञान की देवी को हमने आखिर धन्दे की देवी क्यों बना दिया है? ऐसी शिक्षा का क्या मतलब जो हमे लोगो से नजर चुराने पर विवश कर दे? मास्टर जी के आदर्श आखिर केवल दूसरो के लिए ही क्यों? ऐसे बच्चो का आखिर भविष्य क्या होगा? क्या सच में 60,000 में कुछ नहीं होता? और न जाने क्या क्या।
..........तभी गाड़ी के सामने एक पिल्लै का बच्चा आ गया और मै सड़क पर।,,,,, दुखतो बहुत हुआ पर पिल्लै से ज्यादा अपने सड़क पर आने का,,,,,,,,,!
(फोटो के कुछ अंश को जानबूझकर मैंने ब्लर किया है)

Kinjal Kumar

गुरुवार, जुलाई 11, 2013

उत्तराखंड में तबाही की सच्चाई


हफ्तों से ऊपर हो गया। दिल-ओ-दिमाग पर हिमालय की बाढ़ के दृश्य छाए हुए हैं। खुली आंखों से जो टीवी पर दिख रहा है, आंख बंद करते ही कल्पना में भी वही बर्बादी के मंजर हैं। और बर्बादी का अंदाजा तक सही से नहीं लग पा रहा है। जो इलाके प्रभावित हुए हैं उन तक पहुंचा भी नहीं जा रहा है। इसलिए जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतर रहा है, बर्बादी के अंदाजे और बड़े, और भयावह होते जा रहे हैं।
बर्बादी के जितने भी अंदाजे लगाए जा रहे हैं, उनमें एक बात विशिष्ट है। मरने वालों की तादाद। शुरुआत 200 लोगों की मौत से हुई थी। फिर उत्तराखंड के सीएम ने कहा कि एक हजार लोग मरे हैं। फिर राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री ने कहा कि मरने वालों की तादाद 5000 तक पहुंच सकती है। अब अंदाजे लगाने का तो ऐसा है कि जिसका जो जी करे उतनी संख्या बता दे। समस्या यह है कि सभी अंधेरे में तीर चला रहे हैं क्योंकि सचाई यह है कि हमें कभी पता नहीं चलेगा कि असल में कितने लोग मारे गए। ऐसी डरावनी बात कहने के पीछे मेरा आधार हिमालय का दुर्गम इलाका है। कई कस्बे तो पूरे के पूरे गाद के नीचे कई-कई फुट तक दब गए हैं। उनमें कितने लोग मारे गए होंगे, इसका कभी पता नहीं चल पाएगा। जो लोग बह गए हैं, हो सकता है वे आगे जाकर धारा में कहीं मिल जाएं। लेकिन बहुत संभव है कि बहुत सारे लोग ऐसे इलाकों से लापता हुए होंगे जहां तक पहुंचा ही नहीं जा सकता। वे अब कभी नहीं मिलेंगे। जो कस्बे कई फुट गाद के नीचे दबे हैं, उन तक पहुंचना भी असंभव है। अब अगर कोई निर्माण होगा भी तो उसके ऊपर ही होगा। यानी कभी पता नहीं चलेगा कि नीचे कौन था, क्या था। बहुत सारे लोगों को लगेगा कि मैं कैसी बातें कर रहा हूं। दुखद है, कड़वी है, बहुत उदास करने वाली है, पर यही सचाई है।

अब हमारी कोशिश होनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा प्रभावित लोगों तक पहुंच सकें। स्थानीय लोगों के अलावा वहां टूरिस्ट और श्रद्धालु भी हैं। चार धाम यात्रा चल रही थी इसलिए श्रद्धालुओं की संख्या बहुत ज्यादा है। और गर्मी होने की वजह से पहाड़ों पर इस वक्त टूरिस्ट भी ज्यादा होते हैं। इनमें से लोकल लोगों की संख्या का तो पता लगाया जा सकता है क्योंकि सरकार के पास जनगणना का डेटा होगा। लेकिन टूरिस्ट और श्रद्धालुओं की सही-सही संख्या का पता कैसे लगेगा? धाम यात्राओं में एंट्री भले ही रेग्युलेटेड हो, लेकिन यह रेग्युलेशन सिर्फ एंट्री पॉइंट पर होता है। लेकिन उन लोगों की संख्या भी तो हजारों में होती है जो धाम तक पहुंच जाते हैं और फिर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। इसी तरह टूरिस्टों की संख्या का भी बस अनुमान ही लगाया जा सकता है। हालांकि सरकार में टूरिस्टों की संख्या को लेकर भी बहसबाजी हो रही है, लेकिन कितने लोग आपदा का शिकार हुए और कितने लौट पाए, इसका बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है। जहां तक बचाव कार्यों का सवाल है तो यह सोचकर भी मन कांप उठता है कि ऐसे ऑपरेशन में आर्मी और पैरा मिलिट्री के जवान काम न करते तो क्या होता। हमारे पास राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी है। राज्य सरकार का भी आपदा नियंत्रण विभाग है। लेकिन जब काम करने का मौका आता है ये किसी काम के नहीं रहते। इनमें रीढ़हीन रिटायर्ड बाबू भरे हुए हैं जो सरकरी घर, गाड़ियों और ऐसी सुविधाओं की खातिर अपने सरकारी आकाओं के सामने मिमियाने लगते हैं। और जब जरूरत पड़ती है तो या तो ये लोग गायब होते हैं, या फिर इन्हें पता ही नहीं होता कि क्या करना है और कैसे करना है। इस बार भी कहीं थोड़ी-बहुत कार्रवाई होगी, कई वादे किए जाएंगे। लेकिन कुछ वक्त बाद सब जस का तस हो जाएगा। रिटायरमेंट के बाद पोस्टिंग्स ऐसे ही अंधे की रेवड़ियों की तरह बंटती रहेंगी।
हमेशा सेनाएं ही काम आती हैं। फिर लोगों का यह सोचना कहां गलत है कि जब देश को जरूरत पड़ती है तो सेना के जवान ही हैं जो अपनी जान पर खेलकर भी काम आते हैं। और जब सेनाओं की तारीफ हो रही है, तब कुछ शब्द ऐसी संस्थाओं के लिए भी लिखे जाने चाहिए जिन्हें मीडिया, खासकर अंग्रेजी मीडिया सिर्फ कोसता है। जैसे आरएसएस और बाबा रामदेव के स्वयंसेवक। प्रभावित इलाकों में सबसे पहले ये स्वयंसेवक ही पहुंचे थे। बहुत से लोगों की जान इन्हीं स्वयंसेवकों की कोशिशों, उनकी फर्स्ट एड और उनके लाए खाने की वजह से बची।
किंजल कुमार