शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011
गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011
बुधवार, दिसंबर 29, 2010
bachpan ka safar
अपने बचपन का सफ़र याद आया
मुझको परियों का नगर याद आया
कोई पत्ता हिले न जिसके बिना
रब वहीं शाम-ओ-सहर याद आया
इतना शातिर वो हुआ है कैसे
है सियासत का असर याद आया
रोज़ क्यूँ सुर्ख़ियों में रहता है
है यही उसका हुनर, याद आया
जब कोई आस ही बाक़ी न बची
मुझको बस तेरा ही दर याद आया
जो नहीं था कभी मेरा अपना
क्यूँ मुझे आज वो घर याद आया
उम्र के इस पड़ाव पे आकर
क्यूँ जुदा होने का डर याद आया
माँ ने रख्खा था हाथ जाते हुए
फिर वही दीद-ऐ-तर याद आया
जिसकी छाया तले ‘किरण’ थे सब
घर के आँगन का शजर याद आया
मुझको परियों का नगर याद आया
कोई पत्ता हिले न जिसके बिना
रब वहीं शाम-ओ-सहर याद आया
इतना शातिर वो हुआ है कैसे
है सियासत का असर याद आया
रोज़ क्यूँ सुर्ख़ियों में रहता है
है यही उसका हुनर, याद आया
जब कोई आस ही बाक़ी न बची
मुझको बस तेरा ही दर याद आया
जो नहीं था कभी मेरा अपना
क्यूँ मुझे आज वो घर याद आया
उम्र के इस पड़ाव पे आकर
क्यूँ जुदा होने का डर याद आया
माँ ने रख्खा था हाथ जाते हुए
फिर वही दीद-ऐ-तर याद आया
जिसकी छाया तले ‘किरण’ थे सब
घर के आँगन का शजर याद आया
मंगलवार, दिसंबर 21, 2010
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